जल महल की पैडल-नाव राजनीति
जल महल के किनारे पैडल-नाव आती है, और उसके साथ ही छोटी-सी राजनीति भी। पहले फ़ोटो का कोण तय होता है, फिर कौन आगे बैठे, कौन पीछे, और कौन पैडल चलाते हुए हीरो लगे। घणी गंभीर बात नहीं, पर भाइसाब, फ़्रेम में अपनी तरफ़ सबको बड़ी लगती है। वहाँ हवा हल्की होती है, पानी चुप, और लोग बोलते कम, इशारे ज़्यादा करते हैं। कोई दुपट्टा सँभालता है, कोई टोपी सीधी करता है, कोई “बस एक और चित्र” बोलकर पूरी नाव की व्यवस्था बदल देता है। जयपुर की यह पैडल-नाव कूटनीति सच्ची में छोटी है, पर इसमें अहं भी है, हँसी भी, और एक नरम-सा “म्हारे को भी यहीं से दिखो” वाला अंदाज़ भी.
