जौहरी बाजार: बजट पर कुंदन का नशा
जौहरी बाजार में कुंदन की चमक देखकर आदमी का बजट सीधा पीछे हट जाता है। दुकान के काँच में हार ऐसे चमकते हैं जैसे किसी रानी की छोटी सी याद हो, और हम बस बाहर खड़े होकर “घणी सुंदर” बोल देते हैं। यही तो जयपुर का असली हुनर है: देखना, ताड़ना, और बिना खरीदे भी थोड़ा अमीर लगना। एक आदमी ने एक लटकन को ऐसे देखा जैसे वही उसके लिए बना हो, फिर चुपचाप मुड़ गया। क्यों? क्योंकि दाम पढ़कर उसकी मुस्कान का नंबर 100 से सीधे 0 हो गया। फिर भी, जौहरी बाजार से खाली हाथ लौटना हार नहीं लगती; यह बस बजट के साथ शाही अंदाज़ का छोटा सा समझौता है। बस इतना ही।
