जौहरी बाजार का पान, खरीदारी का आख़िरी पड़ाव
जौहरी बाजार की गर्मी, भीड़ और मोलभाव के बाद पान का छोटा ठेला बिल्कुल आख़िरी पड़ाव लगता है। पहले दुकानदार से दाम कम करवाओ, फिर छत की दीवार जितनी तंग गलियों में चलकर पैर दुखाओ, और आखिर में एक मीठा-सा पान सारी थकान उतार देता है। म्हारे जयपुर में इसे बस पान नहीं, घूमने-फिरने का आख़िरी स्वाद समझो। लाल रंग की वह छोटी-सी टिकिया होंठों पर लगते ही लगता है—दिन पूरा हुआ, अब घर की राह पकड़ो। और हाँ, जो 4 पान का हिसाब है, वह उन्हीं तीन सहेलियों का था जिन्होंने “बस एक ही” बोलकर चार बार माँग किया था।
