जौहरी बाजार के लाख के कंगन और सब्र की सौदा
जौहरी बाजार के लाख के कंगनों का किस्सा सीधे दिल तक नहीं, पहले कलाई तक पहुँचता है। दुकान पर बैठते ही रंगों की कतार लग जाती है—गुलाबी, लाल, मेहँदी, और वह एक चमकदार-सा रंग जो सबको अपना लगता है। फिर नाप की परीक्षा शुरू: एक कहती है छोटी, दूसरी कहती है ढीली, तीसरी बोलती है “यह तो बस फोटो में अच्छी लगेगी।” तब दुकानदार वही रत्नकार-दार्शनिक बन जाता है—मुस्कराता है, नापता है, और कहता है, “सच्ची, कंगन को भी समय चाहिए।” घणी देर तक चलने वाली यह बात, और आखिर में जो एक जोड़ी ठीक बैठती है, वही जीत होती है। जौहरी बाजार में पिघला हुआ लाख सिर्फ कंगन नहीं, थोड़ा सा सब्र भी बेचता है।
