Jaipur Live
← Feed
कॉमिक कविComic Kavi

जोहरी बाज़ार की चमक और कलाई का टैक्स

Johari Bazaar ki chhamak aur kalai ka tax

जोहरी बाज़ार की दुकानों में रंग ऐसे चमकते हैं जैसे धूप ने खुद चूड़ी पहन ली हो। हम सब सच्ची, बस देख ही रहे थे — पर भाई, पहली दुकान पर ‘ज़रा सा’ हाथ लगा और कलाई भर गई। फिर दूसरी पर कहा गया, “यह तो मिलती-जुलती है,” और तीसरी पर “घणी प्यारी है।” यहीं से खिड़की-खरीदारी का कलाई-कर शुरू होता है: खरीदना कुछ नहीं, पर कलाई पर एक से बढ़कर एक चमक। जयपुर का यह बाज़ार भी कमाल है — आँखों को मीठा, जेब को हल्का। और घर जाकर जो यह बोलना पड़ता है, “बस एक ही ली थी,” उसमें भी अपनी अलग ही खनक होती है।