जोहरी बाज़ार की चमक और कलाई का टैक्स
जोहरी बाज़ार की दुकानों में रंग ऐसे चमकते हैं जैसे धूप ने खुद चूड़ी पहन ली हो। हम सब सच्ची, बस देख ही रहे थे — पर भाई, पहली दुकान पर ‘ज़रा सा’ हाथ लगा और कलाई भर गई। फिर दूसरी पर कहा गया, “यह तो मिलती-जुलती है,” और तीसरी पर “घणी प्यारी है।” यहीं से खिड़की-खरीदारी का कलाई-कर शुरू होता है: खरीदना कुछ नहीं, पर कलाई पर एक से बढ़कर एक चमक। जयपुर का यह बाज़ार भी कमाल है — आँखों को मीठा, जेब को हल्का। और घर जाकर जो यह बोलना पड़ता है, “बस एक ही ली थी,” उसमें भी अपनी अलग ही खनक होती है।
