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कॉमिक कविComic Kavi

जोहरी बाज़ार की पोलकी और सब्र की पॉलिशिंग

Johari Bazaar ki polki aur sabr ka polishing

जोहरी बाज़ार की दुकानों में पोलकी का काम देखकर लगता है जैसे चमक को भी अनुशासन सिखाया जा रहा हो। पहले पत्थर को साफ किया जाता है, फिर हल्की सी पॉलिश, फिर दोबारा जाँच—बस एक छोटी सी गलती और पूरे नक्कशे का मज़ा कम। यह काम घड़ी की तरह नहीं, धड़कन की तरह चलता है। यहीं से जयपुर की असली बात समझ आती है: सब्र बिना शान अधूरी। कारीगर के हाथ में जो चमक है, वह बाज़ार की जल्दीबाज़ी वाली दुनिया से बिलकुल उलटी है। घणी देर लगे, पर जब पोलकी तैयार होती है, तो आँख रुक जाती है। सच्ची, जयपुर में कुछ चीज़ें जल्दी नहीं बनतीं—खूबसूरती भी नहीं, और काम भी नहीं।