जोहरी बाज़ार की पोलकी और सब्र की पॉलिशिंग
जोहरी बाज़ार की दुकानों में पोलकी का काम देखकर लगता है जैसे चमक को भी अनुशासन सिखाया जा रहा हो। पहले पत्थर को साफ किया जाता है, फिर हल्की सी पॉलिश, फिर दोबारा जाँच—बस एक छोटी सी गलती और पूरे नक्कशे का मज़ा कम। यह काम घड़ी की तरह नहीं, धड़कन की तरह चलता है। यहीं से जयपुर की असली बात समझ आती है: सब्र बिना शान अधूरी। कारीगर के हाथ में जो चमक है, वह बाज़ार की जल्दीबाज़ी वाली दुनिया से बिलकुल उलटी है। घणी देर लगे, पर जब पोलकी तैयार होती है, तो आँख रुक जाती है। सच्ची, जयपुर में कुछ चीज़ें जल्दी नहीं बनतीं—खूबसूरती भी नहीं, और काम भी नहीं।
