जोहरी बाजार में दाम का खेल
जोहरी बाजार की गलियों में रत्न खरीदना खरीदारी से ज़्यादा नाटक है। पहले दुकानदार पत्थर को रोशनी में घुमा कर ऐसे बोलता है जैसे कोई दोहा सुना रहा हो: “रंग भी गहरा, चमक भी सच्ची।” फिर खरीदने वाला आँख सिकोड़ कर कहता है, “म्हारो भाई, इतना दाम तो सीधे जयपुर के सपने जैसा है।” यहीं से असली खेल शुरू होता है। 8,000 से बात 6,000 पर आती है, फिर चाय के दो घूँट और 5,000 पर टिक जाती है। जो 5,000 रुपये की चुप्पी कार्ड में थी, वही वही अंतिम दाम है — दोनों तरफ थोड़ी जीत, थोड़ी हार। जोहरी बाजार में पत्थर से पहले सब्र बिकता है, और घणी बार वही सबसे महँगा पड़ता है।
