जौहरी बाज़ार: पहनने से पहले देखना
जौहरी बाज़ार में गहना खरीदना खरीदारी कम, परीक्षा ज़्यादा लगता है। एक आंटी सेट उठाती हैं, उलट-पुलट कर देखती हैं, रोशनी में जाँचती हैं, और बोलती हैं, “इसमें चमक ठीक है, पर पत्थर थोड़ा सीधा नहीं।” दूसरी तुरंत निर्णय-पीठ संभाल लेती हैं। पूरा बाज़ार ऐसे चलता है जैसे हर हार की मौखिक परीक्षा हो। “बस एक जोड़ी देखने आए थे” — यह पंक्ति जौहरी बाज़ार में सबसे बड़ा झूठ निकलती है। कुंदन, मीनाकारी, पोलकी, नथ, झुमके… एक दुकान से दूसरी, फिर तीसरी। घणी देर बाद जो सेट पसंद आता है, वह पहले वाले से बिल्कुल अलग होता है। और सच्ची, जयपुर की आंटी को पहनने से पहले देखने का संस्कार न हो, तो बाज़ार भी अधूरा लगे।
