कठपुतली भी घर से सीधी
कठपुतली का खेल देखकर म्हारे जयपुर वाले पहले मुस्कुराते हैं, फिर दो मिनट में अपने घर की याद आ जाती है। रंगीन कपड़े, छोटी सी गुड़िया, और खिंचती डोर—सब कुछ सीधा दिखता है। पर जैसे ही घूमती लकड़ियाँ एक साथ झुकती हैं, याद आता है कि घर में बात इतनी सरल कहाँ होती है। सांगानेर के किसी छत वाले मैदान में यह खेल हो, या जौहरी बाजार के पास किसी मेले-पंडाल में, लोग हँस-हँस कर देखते हैं। और फिर एक पंक्ति सबसे ज़्यादा लगती है: कठपुतली से ज़्यादा तो सास-बहू की डोर कसी होती है। घणी सच्ची बात है—लकड़ियाँ कम से कम मंच पर सच बोल देती हैं, घर में तो हर कोई अपनी चाल चल लेता है।
