कठपुतली कॉलोनी में डोर-हिलाने वाले की असली नाटकबाज़ी
कठपुतली कॉलोनी में एक कारीगर डोर खींच रहा था, और गुड़िया उसके इशारे पर नाच रही थी। पर असली मज़ा तो तब आया जब उसका अपना चेहरा भी मंच का हिस्सा लगने लगा। घणी बड़ी बात है — जो दूसरों को हँसाता है, वह खुद कितना गंभीर दिखता है। यहीं का रंग है: मिट्टी, कपड़ा, लकड़ी और छोटी सी छत के नीचे बना बड़ा सा सपना। कारीगर की उँगलियों में राग भी है और अभ्यास भी। दूर से देखो तो गुड़िया बोलती है; पास से देखो तो हाथ की मेहनत बोलती है। और पधारो, इस कहानी का सबसे खास मोड़ यह है — जिस आदमी के हाथ में सबकी डोर है, उसकी एक छोटी सी हँसी पूरे तमाशे का रुख बदल देती है।
