मोची की पतली बेंच, मोहल्ले का हिसाब
मोची की दुकान बड़ी हो या छोटी, जयपुर में उसकी बेंच अक्सर सबसे जिंदा जगह होती है। पतली सी लकड़ी, पास में नीले का डिब्बा, धागा, कील और एक आधा घिसा जूता — बस इतना सा सामान, पर बात बहुत। मोहल्ले का आदमी यहीं रुकता है, सलाम करता है, और दो मिनट में घर की, बाजार की, स्कूल की बात निकल आती है। यहीं रामू भाई ने तीन जूते सिल दिए और एक बच्चे का पैर नाप कर अलग से नोट कर लिया, क्योंकि अगले हफ्ते स्कूल की छुट्टी के बाद नया जूता लेना था। घणी सीधी बात है: जयपुर में मरम्मत सिर्फ चीज़ ठीक करना नहीं, रिश्ता ठीक रखना भी है। पधारो का शहर कभी-कभी बेंच पर ही सबसे अपना लगता है।
