पचेवर की ब्लू पॉटरी, अलमारी का हीरो
पचेवर की ब्लू पॉटरी का रंग देखो तो लगता है जैसे नीले आसमान ने मिट्टी से दोस्ती कर ली हो। यह काम नाज़ुक है, फिर भी जयपुर के घरों में इसकी प्याली, सुराही और थाली सालों तक टिक जाती हैं। पहले कारीगर मिट्टी, क्वार्ट्ज और चमक देने वाली चीज़ों से सामान बनाता है; फिर ध्यान से सुखाता और पकाता है। असली मज़ा तब आता है जब अलमारी का कोई भाईसाब बिना संभाले प्याली निकाल ले, और घर वाले तुरंत बोलें—“अरे, धीरे!” घणी नाज़ुक कला है, पर ज़िम्मेदारी भी घर वालों की परीक्षा लेती है। पचेवर की इस कला में सुंदरता भी है और अनुशासन भी। सच्ची बात, जो चीज़ नाज़ुक होकर भी रोज़ काम आए, वही जयपुर के स्वभाव जैसी लगती है।
