पतंगबाज़ार में 'बस थोड़ा सा'
पतंगबाज़ार की धूप में डोर, गत्ता और हँसी सब एक साथ बिकते हैं। यहाँ हर दुकानदार और खरीददार का दावा अलग: किसी का मांजा “बस थोड़ा सा” तेज़, किसी की पतंग “बस थोड़ी सी” सीधी। पर जयपुर में थोड़ा सा कभी छोटा नहीं होता, घणी बात होती है। एक हाथ से डोर पकड़ो, दूसरे से भाव-ताव; और आगे वाला भी ऐसे बोलता है जैसे वही जीत रहा हो। थोड़ी देर बाद वही “थोड़ा सा” मांजा उँगली पर निशान छोड़ देता है, और हँसना दोनों को पड़ता है। पधारो के इस शहर में बात का काँटा कभी-कभी डोर से भी ज़्यादा तीखा होता है।
