पत्थर के मंदिर, सॉफ्ट दिल
ओल्ड-सिटी जयपुर के जैन मंदिरों में घुसते ही सबसे पहले चप्पल नहीं, आदत उतरती है। संगमरमर की सफेद ठंडक पैरों को ऐसे पकड़ती है जैसे गर्मी से थकी हुई धरती ने एकदम आराम ले लिया हो। अंदर आवाज़ भी धीमी हो जाती है; घंटी की हल्की तान, कपड़ों की सरसराहट, और लोगों की सिसकी सी चुप्पी मिलकर एक अलग ही राग बना देते हैं। यहीं पर मज़ा है: बाहर का जयपुर तेज, अंदर का जयपुर बिल्कुल नरम। मोहल्ला भी जानता है कि यहाँ ज़ोर से बोलना नहीं, बस धीरे चलना है। दर्शन के बाद जब लोग बाहर निकलते हैं, तो पैरों में ठंडक और मन में सुकून सा रह जाता है। सच्ची, पत्थर के मंदिर होते हुए भी यह जगह दिल को घणी नरम लगती है।
