पाव-भाजी से कुल्हड़ लस्सी तक का राजस्थान
पाव-भाजी की दुकान पर घणी भीड़ थी, तेल की खुशबू हवा में तैर रही थी और तवा अपना पूरा मिजाज दिखा रहा था। तभी बगल में रखे कुल्हड़ में ठंडी लस्सी आई, और भाई साहब, दृश्य बदल गया। एक प्लेट भाजी के बाद जीभ ने कहा, “बस एक घूँट।” फिर घूँट से सीधा ऑर्डर पर चर्चा। “एक और कुल्हड़ ले आओ,” कोई बोला, और मोलभाव शुरू हो गया — मीठी या नमकीन, मलाई कितनी, और कुल्हड़ छोटा या मोटा। जयपुर में नाश्ते का पड़ाव कब दोपहर का भोजन बन जाए, पता ही नहीं चलता। म्हारे यहाँ बात पेट की कम, मन की ज़्यादा होती है। और बिल? वह भी मुस्कराकर आता है।
