पोलों का नियम: घर से बाज़ार तक
जयपुर की पुरानी पोल में गली बस रास्ता नहीं होती, वह समाज का सीधा हिसाब होती है। सुबह किसी के आँगन में रोटी सेंकी जा रही होती है, तो पास वाले घर से पानी की बाल्टी भी पूछ-कर चलती है। छोटी-सी छत, पतली-सी गली, और हर मोड़ पर कोई न कोई जान-पहचान। यही पोल की असली बात है: काम एक घर का लगता है, पर संभलता सब मिलकर है। शादी हो, बर्तन उठाने हों, या त्योहार पर सफाई—एक बुलावे पर आदमी आ जाता है। म्हारे जयपुर में इसे व्यवस्था कम, आदत ज़्यादा समझो। और जो नाया मोहल्ला का मोड़ अभी “तय नहीं हुआ,” वह इसलिए बाकी है क्योंकि वहाँ लोगों ने नया रास्ता मानने से पहले सबकी सहमति का हिसाब माँगा है.
