प्याऊ की ठंडक, जयपुर की पुरानी मेहर
जयपुर के पुराने प्याऊ देखने में सीधे लगते हैं, पर उनमें एक खामोश समझ बसी होती है। छत की दीवार पर छाया, पत्थर की ठंडक, और नीचे रखा पानी का घड़ा—सब मिलकर राहगीर को रोक लेते थे। यहाँ पानी लेना सिर्फ जरूरत नहीं, एक छोटा सा सामाजिक रिवाज था। कोई अपना लोटा भर लेता, कोई हाथ-मुँह धो लेता, कोई दो पल बैठकर साँस सँभाल लेता। घणी गर्मी में यही बड़ा सुकून था, सच्ची। प्याऊ ने जयपुर को सिखाया कि नागरिक मेहरबानी को बड़े शब्द नहीं चाहिए; बस साफ पानी, थोड़ी देखभाल, और सबके लिए खुला कोना काफी है। आज भी वे पत्थर के कियोस्क इसलिए याद आते हैं, क्योंकि उन्होंने प्यास को अकेला नहीं रहने दिया।
