प्याज़ कचौरी और नैतिक दिशा-सूचक
रावत हो या सम्राट, प्याज़ कचौरी का सच पहले कौर में पकड़ा जाता है। गरम, छोटी सी कचौरी फटते ही प्याज़ और मसाला ऐसे बाहर निकलते हैं जैसे उन्हें भी लाइन में आगे निकलना हो। चटनी साइड से आती है, और मुँह के अंदर एक छोटा सा जयपुर मेला लग जाता है। बस यहीं से नैतिक दिशा-सूचक डगमगा जाता है। कपड़ों पर तेल का दाग, उँगली पर मिर्च, और फिर भी आदमी कहता है, “एक और लेते हैं।” म्हारे जयपुर में इसे पेट की कमज़ोरी नहीं, कचौरी की ताकत कहते हैं। सच्ची, जो पहला कौर संभाल ले, उसने आधी ज़िंदगी संभाल ली। बाकी का हिसाब तो छोटी प्लेट और बड़ी भूख करती है.
