प्याज़ कचौरी का दूसरा वार
हवा महल के छोटे से नाश्ते वाले कोने में प्याज़ कचौरी आती है, गरम-गरम, ऊपर से थोड़ी फूली हुई और अंदर प्याज़ की वह खुशबू जो सीधे मन तक जाती है। पहला कौर लेते ही लगता है, ‘बस इतना काफ़ी है।’ फिर चटनी लगती है, और ज़ुबान बोलती है, ‘अरे म्हारे, एक और तो बनती है।’ यही जयपुर का असली खेल है: पहले पेट समझाता है, फिर दिल जीत जाता है। घणी तीखी हरी चटनी और मीठी इमली का जोड़ ऐसा है कि आत्म-नियंत्रण भी थोड़ा सा किनारे हो जाए। और जब प्लेट खाली हो, तब याद आता है — मँगाई एक ही थी। बस इसी पछतावे में दूसरी प्लेट का फैसला पक्का हो जाता है।
