प्याज़ कचौरी: लाइन, सब्र, और भूख
ओल्ड सिटी के एक छोटे काउंटर के बाहर सुबह से ही लाइन सीधी खड़ी होती है। समोसे नहीं, प्याज़ कचौरी का मिज़ाज अलग होता है: एक हाथ में पैसे, दूसरे में धैर्य। लोग धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं, पर कोई धक्का-धुकी नहीं; जयपुर की इस कतार में सबको पता है कि भूख के साथ सब्र भी गरम रहना चाहिए। फिर बारी आती है और असली परीक्षा शुरू: “भाईया, एक अतिरिक्त मिर्च।” यही वह जगह है जहाँ आदमी का स्वभाव खुल जाता है। बगल वाली आंटी का चेहरा, स्कूल से छुट्टी का बच्चा, और साइकिल पर खड़ा वह अंकल — सब एक ही मैदान के खिलाड़ी। घणी सच्ची बात, प्याज़ कचौरी खाने से पहले उसकी लाइन जीतनी पड़ती है।
