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कॉमिक कविComic Kavi

संक्रांति की छत: जयपुर की नम्र जंग

Sankranti ki chhat: Jaipur ki polite jung

संक्रांति के दिन जयपुर की छतों पर माहौल अलग ही होता है। कहीं छोटा बच्चा डोर संभाले, कहीं चाचा अपनी कुर्सी को धूप में घुमा दे, और कहीं पड़ोसी की आँख सीधे आसमान पर टिक जाए। पतंग का खेल साधारण लगता है, पर छत की दीवार से लेकर गली के कोने तक सब इसमें शामिल हो जाते हैं। मज़ा तब आता है जब एक पतंग कटकर किसी और की छत पर उतर आए, और पूरे मोहल्ले की इज़्ज़त उसी पल में तंग पड़ जाए। घणी शान से उड़ाई गई गुड्डी कभी-कभी बस एक ही डोर से हार जाती है। जयपुर का यह polite battleground सच्ची में पधारो वाली नहीं, बल्कि ‘बस थोड़ा और’ वाली जंग है।